श्रीनगर गढ़वाल। लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र द्वारा आयोजित लोक संगीत कार्यशाला के अंतर्गत चल रहे नरेन्द्र संगीत सप्ताह के छठे दिन कार्यक्रम लोकसंगीत, संस्कृति और भावनात्मक जुड़ाव का अद्भुत संगम बन गया। इस अवसर पर कलाकारों ने उत्तराखंड के महान लोकगायक और रचनाकार नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों की लाजवाब प्रस्तुतियां देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में श्रोताओं की उत्साहपूर्ण और मनोयोगपूर्ण सहभागिता ने यह साबित कर दिया कि नेगी जी के गीत आज भी जनमानस की संवेदना, संस्कृति और जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
कार्यक्रम में कलाकारों द्वारा गीतों का चयन इस प्रकार किया गया कि दर्शक पूरे समय उससे जुड़े रहे। प्रस्तुत किए गए गीतों में लोकजीवन, प्रेम, पीड़ा, प्रकृति, रिश्तों और पहाड़ की माटी की सुगंध का प्रभावी चित्रण दिखाई दिया। यही कारण रहा कि कार्यक्रम केवल एक सांगीतिक प्रस्तुति भर नहीं रहा, बल्कि संस्कृति के विविध रंगों का जीवंत उत्सव बन गया।
इस अवसर पर कार्यक्रम में पहुंचे पौड़ी के विधायक राजकुमार पोरी ने कहा कि यह आयोजन हमारी संस्कृति की पहचान है, जहां श्रोताओं को अपनी परंपरा और लोकजीवन के अनेक रंग देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज नेगी जी के गीतों पर शोध हो रहा है और नई पीढ़ी उनके गीतों से गाना सीख रही है। इससे यह कार्यक्रम और भी अधिक प्रासंगिक बन गया है। उन्होंने कहा कि नेगी जी का रचना संसार हमारी संस्कृति का एक जीवंत दस्तावेज है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत का कार्य करेगा।
नगर निगम श्रीनगर की महापौर श्रीमती आरती भण्डारी ने अपने संबोधन में कहा कि यह कार्यक्रम हमारी संस्कृति, हमारी भाषा और हमारे संस्कारों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि नेगी जी के गीतों से इस माटी की महक आती है और उनके गीतों के बोल हमारी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। महापौर ने कहा कि वे हमारे समय के ऐसे विरल रचनाकार हैं, जिनके गीतों को तीन-तीन पीढ़ियां एक साथ बैठकर सुन सकती हैं। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि नेगी जी के बारे में कहना जितना सरल नहीं, उनके गीतों को गुनगुनाना उतना सहज है, और उनका नाम आते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है।

कार्यक्रम में मिजोरम विश्वविद्यालय से आए स्कूल ऑफ अर्थ साइंस के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि यह एक अद्भुत संयोग है कि जिनके गीत सुनते हुए वे बड़े हुए, आज उसी गायक के गीत-संगीत पर केन्द्रित कार्यक्रम में शामिल होने का सौभाग्य मिला है। उन्होंने इस आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक अनुष्ठान बताया और कहा कि यह हमारी संस्कृति का उरोज है, जो समाज की सांस्कृतिक चेतना को ऊंचाई प्रदान कर रहा है।
इस अवसर पर कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे शोधकर्ता तथा भारतीय जनता पार्टी के जनपद पौड़ी के जिलाध्यक्ष कमल किशोर रावत ने कहा कि नेगी जी हमारे समय के ऐसे गायक हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की है, और आज तक कोई भी गायक उनकी मौलिकता और शैली की बराबरी नहीं कर सका है। उन्होंने कहा कि यह भी अत्यंत आश्चर्यजनक और प्रेरणादायी है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी नेगी जी जिस ऊर्जा और संवेदनशीलता के साथ गीतों की रचना कर रहे हैं, उसका कोई सानी नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि हृदयाघात जैसी गंभीर परिस्थिति के बाद भी नेगी जी ने अपनी गीत-यात्रा को और अधिक ऊर्जा और ऊंचे स्वर में जारी रखा है, जो उन्हें विशिष्ट और असाधारण बनाता है।
नरेन्द्र संगीत सप्ताह के छठे दिन मंच पर कलाकारों ने एक से बढ़कर एक गीत प्रस्तुत कर वातावरण को सांगीतिक ऊंचाई प्रदान की।
राजेन्द्र पंवार ने “जौ जस देई दैणु ह्वे जैई”,
प्रदीप कुमार ने “तेरी पिड़ा मा द्वी आंसु मेरा भी”,
प्रेमलता रावत ने “असाड़ कुएड़ी लौंकण से पैली”,
आयुषी काण्डपाल ने “द्वी गती बैशाख सुर्मा”,
माही कण्डवाल ने “फ्योंलि ज्वान ह्वेगे”,
अमित खण्डूड़ी ने “पैर-पैर गौरा तू”,
अभिषेक रावत ने “भलु लगद भनुलि तेरु”,
सोनाली ने “माछी पाणी सि ज्यू तेरु-मेरु”,
विमल सोनियाल ने “रोग पुरणू कटे ज़िन्दगी नई ह्वेगे”,
उत्कर्ष नेगी ने “सुपिन्यु ह्वे होलु कि बैम रै होलु” तथा
आयुषी बेदवाल ने “हे जी सार्यूं मा फूलीगे होलि फ्यूंली लयड़ि” गीत प्रस्तुत किया।

सभी प्रस्तुतियों को श्रोताओं ने पूरे मनोयोग और आत्मीयता के साथ सुना। कार्यक्रम में लोकसंगीत के प्रति लोगों की बढ़ती रुचि और अपने सांस्कृतिक स्रोतों से जुड़ाव साफ दिखाई दिया। नेगी जी के गीतों ने एक बार फिर यह साबित किया कि वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकचेतना, सामाजिक अनुभव और सांस्कृतिक स्मृति के दस्तावेज हैं।
यह आयोजन न केवल लोकसंगीत के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सार्थक कदम सिद्ध हो रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, भाषा, लोकभावना और सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी कर रहा है। नरेन्द्र संगीत सप्ताह का छठा दिन इस दृष्टि से बेहद यादगार रहा, जहां गीतों के माध्यम से परंपरा, संवेदना और सांस्कृतिक गौरव का भव्य संगम देखने को मिला।

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