भगवान श्रीहरि विष्णु ने धरती पर कई अवतार लिए, जिनमें श्रीकृष्ण को संपूर्ण और पूर्णावतार माना जाता है। उन्होंने धर्म की पुनःस्थापना, अधर्म का नाश और गीता का उपदेश देकर मानव जाति को जीवन का वास्तविक ज्ञान दिया। लेकिन श्रीकृष्ण का जीवन जितना अद्भुत और चमत्कारी था, उनका अंत उतना ही मार्मिक और रहस्यमय था। उनके जीवन के अंतिम दिनों में उनके संपूर्ण यदुवंश का विनाश हो गया और स्वयं श्रीकृष्ण ने भी पृथ्वी से विदा ली।
आइए जानते हैं कि कैसे यदुवंश का नाश हुआ और श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग किया।
भगवान विष्णु के अवतार और श्रीकृष्ण की भूमिका
भगवान विष्णु ने धरती पर अब तक 10 अवतार लिए हैं:
- मत्स्य अवतार – जलप्रलय में राजा सत्यव्रत को बचाया।
- कूर्म अवतार – देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में सहायता की।
- वराह अवतार – दानव हिरण्याक्ष से पृथ्वी की रक्षा की।
- नरसिंह अवतार – दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप का वध किया।
- वामन अवतार – बलि राजा से तीन पग में पूरा ब्रह्मांड नाप लिया।
- परशुराम अवतार – अधर्मी क्षत्रियों का संहार किया।
- राम अवतार – रावण का वध कर अयोध्या में धर्म की स्थापना की।
- कृष्ण अवतार – अधर्म और अन्याय का अंत कर गीता का ज्ञान दिया।
- बुद्ध अवतार – अहिंसा और करुणा का संदेश दिया।
- कल्कि अवतार – कलियुग के अंत में अवतार लेंगे और धर्म की पुनःस्थापना करेंगे।
इन सभी अवतारों में श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना गया क्योंकि उन्होंने ईश्वरत्व की संपूर्ण लीलाओं का प्रदर्शन किया।

गांधारी के श्राप से हुआ यदुवंश का विनाश
महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए पांडवों का साथ दिया और अधर्म पर चलने वाले कौरवों का विनाश हुआ। युद्ध में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन सहित 100 कौरव भाई मारे गए।
जब युद्ध समाप्त हुआ, तो कौरवों की माता गांधारी अपने पुत्रों के नाश से अत्यंत दुखी और क्रोधित थीं। उन्होंने श्रीकृष्ण को दोषी ठहराया और उन्हें श्राप दिया:
“हे कृष्ण! जिस प्रकार मेरे समस्त पुत्रों का नाश हुआ है, ठीक उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी नाश होगा।”
गांधारी के इस श्राप के प्रभाव से यदुवंशियों में धीरे-धीरे कलह और मतभेद बढ़ने लगे, जिसका परिणाम कुछ वर्षों बाद देखने को मिला।
यदुवंश का विनाश कैसे हुआ?
महाभारत युद्ध के बाद कई वर्ष बीत गए। एक दिन श्रीकृष्ण अपने यदुवंशी वंशजों के साथ प्रभास क्षेत्र में एक धार्मिक यात्रा पर गए। वहां सभी ने भोजन और मदिरा का सेवन किया।
मदिरा के प्रभाव में यदुवंशी आपस में ही झगड़ने लगे। अचानक, वीर योद्धा सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। क्रोधित होकर सात्यकि ने कृतवर्मा का वध कर दिया। इस घटना से बाकी यदुवंशी भी उग्र हो गए और दो गुटों में बंट गए।
धीरे-धीरे यह झगड़ा एक भीषण युद्ध में बदल गया, जिसमें यदुवंशी एक-दूसरे को मारने लगे। इस महासंहार में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न, उनके प्रिय मित्र सात्यकि और अन्य सभी यदुवंशी मारे गए।
यदुवंश के इस संहार से व्यथित होकर श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी ने भी योगबल से अपना शरीर त्याग दिया।
इस प्रकार गांधारी के श्राप के अनुसार, संपूर्ण यदुवंश नष्ट हो गया।
श्रीकृष्ण की मृत्यु कैसे हुई?
यदुवंश के नाश के बाद, श्रीकृष्ण अत्यंत दुखी हो गए और वे वन में एकांतवास के लिए चले गए।
एक दिन वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान में लीन थे। उसी समय, जरा नामक एक बहेलिया वहां आया। उसने दूर से श्रीकृष्ण के पैर के तलवे को हिरण की आँख समझ लिया और उस पर तीर चला दिया।
जब बहेलिए को अपनी भूल का एहसास हुआ, तो वह घबराकर श्रीकृष्ण के पास आया और क्षमा मांगने लगा।
तब श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर कहा:
“जरा, यह तुम्हारी गलती नहीं, यह तो विधि का विधान था। तुमने वही किया जो नियति ने लिखा था। अब तुम मेरी आज्ञा से स्वर्ग प्राप्त करोगे।”
इसके बाद श्रीकृष्ण ने योगबल से अपना शरीर त्याग दिया और वैकुंठ धाम चले गए।
श्रीकृष्ण की पत्नियों और परिवार का अंत
जब श्रीकृष्ण और बलराम का देहांत हो गया, तो उनके प्रियजनों ने भी गहरे शोक में अपने प्राण त्याग दिए।
- माता देवकी, रोहिणी, और वसुदेव ने समाधि ले ली।
- बलरामजी की पत्नियों ने भी शरीर छोड़ दिया।
- श्रीकृष्ण की 16,108 रानियों ने भी आत्मदाह कर लिया।
इस प्रकार, एक महान वंश का अंत हो गया और द्वारका नगरी भी समुद्र में समा गई।

श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया था, लेकिन उनके जाने के साथ ही यदुवंश का भी अंत हो गया। गांधारी के श्राप के कारण यदुवंशियों ने आपसी कलह में ही एक-दूसरे का संहार कर लिया और अंततः स्वयं श्रीकृष्ण ने भी पृथ्वी छोड़ दी।
उनका जीवन और उनकी शिक्षाएं आज भी अमर हैं और गीता का ज्ञान मानवता के लिए पथप्रदर्शक बना हुआ है।
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