
हाल ही में एक वीडियो ने भयावह सच्चाई उजागर की है कि कैसे मुनाफे पर टिकी व्यवस्था हमारी सबसे बुनियादी ज़रूरत—जल—को धीरे-धीरे ज़हर में तब्दील कर रही है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि आज के भारत की दर्दनाक हकीकत है।
आज देश की अधिकांश नदियाँ—चाहे वह गंगा हो, यमुना हो, या गोदावरी—औद्योगिक कचरे और अनुपचारित घरेलू गंदे पानी के बोझ तले दम तोड़ रही हैं। फैक्ट्रियों से निकलता जहरीला रासायनिक अपशिष्ट और शहरों की गंदी नालियाँ बिना किसी उपचार के सीधे जलस्रोतों में विसर्जित की जा रही हैं। इससे न केवल हमारी पुण्य नदियाँ कलुषित हो रही हैं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
विडंबना यह है कि छोटी-छोटी बातों पर भावनाएँ आहत करने वाले लोग इस सबसे बड़े राष्ट्रीय मुद्दे पर मूकदर्शक बने रहते हैं।
जब विषैला रासायनिक अपशिष्ट सीधे हमारी नदियों में मिलाया जा रहा है, जब करोड़ों परिवारों का पेयजल प्रदूषित हो रहा है, जब मासूम बच्चे और बुजुर्ग गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, जब हमारी पारिस्थितिकी का संतुलन चरमरा रहा है—तब उनकी आहत भावनाओं का कोई शोर नहीं सुनाई देता।
एक फिल्म के संवाद पर, किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर, या किसी प्रतीक चिह्न पर हंगामे खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन जब सवाल करोड़ों नागरिकों के अस्तित्व और भविष्य से जुड़े जलाशयों के विनाश का होता है, तो वहाँ सन्नाटा पसरा रहता है। यह चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि हमने वास्तविक मुद्दों को नज़रअंदाज करना सीख लिया है।
यदि सचमुच हम किसी बात पर सामूहिक रूप से आहत होना चाहते हैं, तो वह हमारी नदियों का यह अनुठान नरसंहार है। यह मुनाफाखोरी और औद्योगिक लालच का वह चेहरा है, जो प्रकृति के गर्भ में ही ज़हर उगल रहा है।
हमें यह समझना होगा कि नदियों से यह खिलवाड़ केवल पर्यावरण पर हमला नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, पहचान और अस्तित्व पर भी वार है। अब समय आ गया है कि इस चुप्पी को तोड़ा जाए और ‘लाभ’ की इस अंधी दौड़ को ‘जीवन’ के मानदंडों पर कसा जाए। तभी हमारी नदियाँ फिर से जीवित हो सकेंगी, और हम अपने भविष्य को विषमय होने से बचा सकेंगे।

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