79 नाली भूमि नीलामी: टिहरी के 22 गांवों ने कलेक्ट्रेट घेरा, 23 जून को दिया अल्टीमेटम

टिहरी गढ़वाल। सोमवार को नई टिहरी का कलेक्ट्रेट परिसर सियासत और जनाक्रोश का केंद्र बना रहा। वजह थी—रामगांव और बौर गांव की 79 नाली (1.577 हेक्टेयर) चारागाह भूमि की नीलामी। थौलधार ब्लॉक के करीब 22 गांवों ने संयुक्त मोर्चा बनाते हुए ढाईजर (डाइजर) से विशाल रैली निकाली और जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर धरना दिया।

ग्रामीणों ने डीएम नितिका खंडेलवाल को ज्ञापन सौंपते हुए निविदा तत्काल रद्द करने की मांग रखी। साथ ही मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर इस मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि अगर 23 जून (मंगलवार) तक नीलामी रद्द नहीं हुई तो विवादित भूमि पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया जाएगा।

रैली को संबोधित करते हुए प्रतापनगर विधायक विक्रम सिंह नेगी ने कहा कि सरकार पंचायती जमीन बेचकर ग्रामीणों के हक-हकूक पर डाका डाल रही है। उन्होंने कहा, “अगर इस जमीन पर स्कूल-अस्पताल बनता तो हम स्वागत करते, लेकिन भू-माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए नीलामी बर्दाश्त नहीं होगी।”

मूल निवास भू कानून प्रकोष्ठ के नेता लूशुन टोडरिया ने सरकार पर सीधा प्रहार करते हुए कहा, “क्या यह नीलामी किसी बाहरी पूंजीपति को जमीन देने के लिए रखी गई है? जब निविदा में न तो मूल निवास का पैमाना है और न स्थायी निवास की शर्त, तो यह साफ है कि सरकार जमीन बचाने नहीं, बेचने का खेल खेल रही है।”

पूर्व उप प्रमुख कुलदीप पंवार ने कहा कि यह 79 नाली जमीन सिर्फ दो गांवों की नहीं, बल्कि पूरे इलाके की सामूहिक धरोहर है, जिसे बचाकर रखा जाना जरूरी है।

खास बात यह रही कि इस आंदोलन में भाजपा, कांग्रेस और यूकेडी सहित तमाम दलों के नेता एक मंच पर नजर आए। कांग्रेस जिलाध्यक्ष मुरारी लाल खंडवाल, UKD जिलाध्यक्ष डीडी पंत, भाजपा के पूर्व जिला मीडिया प्रभारी डॉ. प्रमोद उनियाल, जिला पंचायत उपाध्यक्ष मान सिंह रौतेला, पूर्व दर्जाधारी अतर सिंह तोमर, जिला पंचायत सदस्य शीशपाल राणा और प्रधान संगठन के अध्यक्ष युद्धवीर सिंह रावत सहित कई जनप्रतिनिधि इस रैली में शामिल हुए।

इस पूरे प्रदर्शन का नेतृत्व पैतृक भूमि संरक्षण समिति, न्याय पंचायत रामगांव के अध्यक्ष नत्थी सिंह कैंतूरा ने किया। उनके साथ बड़ी संख्या में ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्य और सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि टिहरी बांध ने पहले ही जंगल निगल लिए, अब बची-कुची चारागाह जमीन को नीलाम करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

अब सबकी निगाहें 23 जून और 26 जून (प्री-बिड बैठक) पर टिकी हैं। प्रशासन चाहे जितनी भी नियम-कानून की बात कर ले, लेकिन 22 गांवों का यह गुस्सा—जो आज कलेक्ट्रेट तक गूंजा—यह साफ संदेश दे गया है कि चारागाह की नीलामी को लेकर जंग अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि शुरू हुई है।

Static 1 Static 1
ऐसी और भी खबरें पढ़ने के लिए बने रहें merouttarakhand.in के साथ।
Subscribe our Whatsapp Channel
Like Our Facebook & Instagram Page
RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments