सिंधु की पुकार: संप्रभुता की वापसी और गौरव की बहाली

  • श्री अर्जुन राम मेघवाल,
    केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार)

मानसून भारत में नवजीवन और राष्ट्र के आर्थिक पुनरुत्थान का प्रतीक है। यह न केवल खेतों को सींचता है, बल्कि देश की नदियों को पुनर्जीवित कर जल संसाधनों को समृद्ध करता है। स्वतंत्रता दिवस के साथ इसका मेल देशभक्ति की भावना को और प्रबल करता है। इसी पृष्ठभूमि में संसद के विशेष मानसून सत्र को प्रधानमंत्री ने “भारत का गौरवशाली सत्र” कहा, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और सिंधु जल संधि के स्थगन जैसे ऐतिहासिक निर्णयों ने भारत की संप्रभुता को पुनर्स्थापित करने की दिशा में साहसिक कदम उठाए।

1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई सिंधु जल संधि ने भारत को सिंधु, चिनाब और झेलम जैसी पश्चिमी नदियों पर नियंत्रण छोड़ने के लिए बाध्य किया। यह समझौता भारत के शुष्क क्षेत्रों—पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—के जल विकास की संभावनाओं को बाधित करता है। संधि के तहत पाकिस्तान को 80% जल का अधिकार मिला, जबकि भारत को मात्र 20%। यह एकतरफा समझौता था, जिसे संसद में बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद की आलोचना को नासमझी करार दिया, जबकि विपक्षी सांसदों ने इसे राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता बताया।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने भी स्वीकार किया कि संधि की शर्तें उनके पक्ष में नहीं थीं, लेकिन भारत की कूटनीतिक कमजोरी ने उन्हें लाभ पहुंचाया। नेहरू ने स्वयं बाद में स्वीकार किया कि संधि से अपेक्षित समाधान नहीं मिले। यह संधि भारत के लिए जल कूटनीति की विफलता और पाकिस्तान के लिए राजनीतिक विजय साबित हुई।

अब मोदी सरकार ने इस ऐतिहासिक भूल को सुधारते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया है। यह निर्णय तब तक प्रभावी रहेगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन नहीं छोड़ता। प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट संदेश—“पानी और खून साथ-साथ नहीं बह सकते”—इस नीति परिवर्तन की गंभीरता को दर्शाता है। यह कदम केवल कूटनीतिक पुनर्संतुलन नहीं, बल्कि भारत के जल संसाधनों, किसानों और विकास लक्ष्यों की रक्षा का साहसिक दावा है।

सिंधु जल संधि का स्थगन भारत की जल संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। इससे भारत जलवायु-अनुकूल अवसंरचना विकसित कर सकता है, सिंचाई व्यवस्था को मजबूत कर सकता है और औद्योगिक विकास को गति दे सकता है। यह निर्णय आत्मनिर्भरता, स्थिरता और समावेशी विकास के मिशन से जुड़ा है, जो भारत@2047 के सपने को साकार करने की दिशा में एक निर्णायक पहल है। यह केवल एक संधि का अंत नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और गौरव की पुनर्बहाली का उद्घोष है।
( लेख में व्यक्त विचार निजी हैं )

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