उज्जैन महाकाल के लिए प्रसिद्ध है और उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित एक अत्यंत रहस्यमयी जागृत स्थल है, जो नागचंद्रेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर का महादेव से गहरा सम्बन्ध है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यह मंदिर साल में केवल एक दिन नागपंचमी के अवसर पर ही दर्शन के लिए खुलता है। ऐसा क्यों, चलिए जानते हैं…
उज्जैन का महाकाल मंदिर तीन तल पर निर्मित है, नीचे महाकालेश्वर, मध्य में ओंकारेश्वर और सबसे ऊपर नागचंद्रेश्वर मंदिर। वैसे, तो वासुकी नाग भगवान् शिव के गले में लिपटा रहता है लेकिन नागचंद्रेश्वर मंदिर में सर्प शिवजी के गले में लिपटा नहीं है, बल्कि भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी सर्प शय्या पर विराजमान हैं। यह मूर्ति दुनिया में अपने आप में अनोखी है। इस मंदिर में शिवलिंग पर चंद्रमा और नाग की विशेष प्रतिमा विराजमान है, इसलिए इसे नागचंद्रेश्वर कहा जाता है। यहाँ भगवान शिव की मूर्ति पर नाग और चंद्रमा का अद्भुत संयोजन दिखता है। दिलचस्प बात यह है कि महाकालेश्वर मंदिर के तीसरे तल पर स्थित यह मंदिर आम दिनों में दर्शन के लिए उपलब्ध नहीं रहता। यह मंदिर केवल नाग पंचमी के दिन (श्रावण शुक्ल पंचमी) खुलता है, बाकी पूरे वर्ष बंद रहता है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर की पौराणिक कथा
स्कंद पुराण के अवंत्यखंड में नागचन्द्रेश्वर का उल्लेख है। पुराणों की कथा के अनुसार, एक बार सर्पराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। तक्षक नाग ने शिवजी से अनुरोध किया कि वह उनके सान्निध्य में एकांत में वास करना चाहते हैं। इसी कारण यह मंदिर वर्ष भर बंद रहता है और केवल नागपंचमी के दिन ही इसके पट खोले जाते हैं, ताकि तक्षक नाग की एकांत साधना में विघ्न न पड़े।

नागचंद्रेश्वर मंदिर की विशेषताएँ
परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के करीब इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिंधिया परिवार के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। यहाँ 11वीं शताब्दी की एक दुर्लभ मूर्ति है, जिसमें भगवान शिव, पार्वती, कार्तिकेय और गणेश जी सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मूर्ति में ऊपर की ओर सूर्य और चन्द्रमा भी है। यह प्रतिमा नेपाल से लाई गई थी। आमतौर पर विष्णु भगवान को सर्प शय्या पर दिखाया जाता है, लेकिन यहाँ शिव-पार्वती सर्पराज तक्षक के फनों पर विराजमान हैं। इसमें नागचंद्रेश्वर सात फनों से सुशोभित हैं। मंदिर के द्वार केवल श्रावण शुक्ल पंचमी को रात 12 बजे से अगले दिन रात 12 बजे तक खुलते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शन से सर्प दोष, कालसर्प योग आदि से मुक्ति मिलती है।
नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा
नाग पंचमी पर हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं और मानते हैं कि इससे पितृ दोष, नागदोष और कालसर्प दोष का नाश होता है। माना जाता है कि नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने से सर्प भय दूर होता है, संतान सुख की प्राप्ति होती है और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। नागपंचमी के अवसर पर नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा की जाती है, जिसका मतलब होता है, तीन अलग-अलग समय पर अलग अलग पूजा। सबसे पहली पूजा मध्यरात्रि में महानिर्वाणी संतों द्वारा होती है, दूसरी पूजा नागपंचमी के दिन दोपहर में सरकार द्वारा की जाती है और तीसरी पूजा नागपंचमी की शाम को भगवान महाकाल की पूजा के बाद मंदिर समिति करती है। इसके बाद रात बारह बजे फिर से एक वर्ष के लिए कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
डिसक्लेमर :-
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