देहरादून । गोवर्धन पूजा का पावन पर्व देशभर में उल्लास और श्रद्धा के वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के गोवर्धन पर्वत धारण करने के दिव्य प्रसंग को स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना की। इसी क्रम में, गोवर्धन के पुंडीर परिवार ने भी अपनी पीढ़ियों से चली आ रही गौ-सेवा की परंपरा को नमन किया और सनातन संस्कृति के संरक्षण का संकल्प दोहराया। परिवार के वरिष्ठ सदस्य जोगेंद्र सिंह पुंडीर ने समस्त देशवासियों को गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
पुंडीर परिवार और गायों का रिश्ता आध्यात्मिक माना जाता है। यह संबंध केवल धार्मिक नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और प्रेम का प्रतीक है। गोवर्धन पूजा के अवसर पर परिवार द्वारा सैकड़ों गायों को सजाया गया, उनका पूजन किया गया और उन्हें विशेष व्यंजन खिलाए गए। इस परंपरा के माध्यम से पुंडीर परिवार ने यह संदेश दिया कि गाय केवल धर्म का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के संतुलन की धुरी भी है।

पूरे भारत में यह पर्व विविध परंपराओं और लोकरीतियों के साथ मनाया जाता है। मंदिरों और घरों में अन्नकूट के रूप में पर्वत सदृश भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें चावल, सब्जियाँ और मिठाइयाँ शामिल होती हैं। वहीं गौ-पूजा के अंतर्गत गायों को नहलाकर, मालाओं से सजाकर उनकी आरती की जाती है। वृंदावन और गोवर्धन में श्रद्धालु पर्वत की परिक्रमा करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की कृपा की कामना करते हैं। भक्ति गीतों, भजन-कीर्तन और आरती के साथ दिनभर वातावरण आध्यात्मिकता से सराबोर रहता है।
इस अवसर पर जोगेंद्र सिंह पुंडीर ने कहा कि सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए हर व्यक्ति को जागरूक होना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संस्कृति और परंपरा के पुनर्जागरण के लिए किए जा रहे प्रयासों का समर्थन करते हुए कहा कि गंगा, हिमालय और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी है।

उन्होंने आगे कहा कि “हमारे बुजुर्गों ने हमें सिखाया है कि अपने संस्कारों, परंपराओं और त्यौहारों को आत्मीयता से मनाएं ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से जुड़ी रहें। गोवर्धन पूजा का यह पर्व किसानों के लिए भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी समय धान की कटाई आरंभ होती है। यह प्रकृति, परिश्रम और श्रद्धा का संगम है।”
पुंडीर ने आगे कहा, “शांतिकुंज में लिखा है — हम बदलेंगे, जग बदलेगा। इसलिए सबसे पहले हमें स्वयं में परिवर्तन लाना होगा। जब हम अपने जीवन में संस्कारों को उतारेंगे, तभी समाज और देश में भी बदलाव आएगा। उत्तराखंड जैसी देवभूमि, जहाँ असंख्य देवी-देवताओं का वास है, उसे और अधिक सनातन संस्कृति से जोड़ने का प्रयास हम सबको मिलकर करना चाहिए।”

गोवर्धन पूजा का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विनम्रता, कृतज्ञता और पर्यावरण संतुलन का संदेश देने वाला उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि मानव और प्रकृति का रिश्ता अटूट है, और इस बंधन की रक्षा ही सच्ची पूजा है। पुंडीर परिवार की यह पुश्तैनी सेवा और उनकी आस्था, सनातन संस्कृति के जीवंत स्वरूप की साक्षी है — जो हर युग में “गोवर्धन” की तरह ही स्थिर, पवित्र और प्रेरणादायक बनी रहेगी।

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