किसकी मृत्यु कब आ जाए, कोई नहीं जानता। कुछ लोगों के घर में यह मृत्यु कई बार पर्व-त्यौहार पर ही दस्तक दे देती है। उनका कोई अपना इस दिन संसार को विदा कहकर चला जाता है। उस साल का वो दिन तो उनके लिए शोक भरा होता है लेकिन सवाल यह है कि क्या आने वाले सालों में उस दिन पर्व-त्यौहार की खुशियाँ छोड़कर सिर्फ शोक मनाना चाहिए या फिर उस पर्व-त्यौहार के दिन आपका जीवन भी बाकियों की तरह सामान्य रूप से चलना चाहिए? वैसे, त्यौहार पर किसी प्रियजन का असामयिक निधन होना परिवार के लिए गहरा धक्का होता है। लेकिन वक्त के साथ दुःख कम होता जाता है। ऐसे में, अगले साल के त्यौहार में क्या करना चाहिए, चलिए प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज से जानते हैं…त्यौहार के दिन किसी की मौत हो जाए, तो क्या दुबारा त्यौहार मनाना चाहिए ?
प्रेमानंद महाराज से जब किसी भक्त ने ये सवाल पूछा कि यदि किसी परिवार में त्यौहार के दिन किसी की मृत्यु हो जाए, तो उस शोक के कारण हमेशा के लिए त्योहार बंद करना शास्त्रसम्मत है या नहीं, तो प्रेमानंद महाराज का कहना था कि शोक की अवधि तक उत्सव न मनाना उचित है, लेकिन उसके बाद त्यौहार अवश्य मनाना चाहिए क्योंकि त्यौहार धर्म, परंपरा और ईश्वर की आराधना से जुड़े होते हैं, न कि केवल व्यक्तिगत परिस्थितियों से।
पारंपरिक हिन्दू मान्यताओं में मृत्यु के समय और उसके बाद के कुछ दिन को शोक-आवधि माना जाता है। इस अवधि में त्यौहार, उत्सव इत्यादि को टाला जाता है। हिन्दू धर्म में 13 दिनों तक शोक मनाने की प्रथा है। इस दौरान कोई भी उत्सव या त्योहार नहीं मनाया जाता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आने वाले वर्षों में भी वही त्योहार न मनाया जाए। त्योहार केवल व्यक्तिगत खुशी नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक परंपरा हैं। इन्हें न मनाना अपने धर्म और परंपरा से दूरी बनाना है। प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि त्यौहार, भगवान की पूजा और स्मरण का अवसर हैं, इन्हें रोकना उचित नहीं है।
कई जगह यह मान्यता है कि यदि किसी विशेष दिन मृत्यु हो जाए, तो उस दिन का त्योहार परिवार में नहीं मनाया जाता। कुछ परिवार इसे सालों तक टालते हैं और कहीं-कहीं तब तक नहीं मनाते जब तक उसी दिन कोई नया जन्म न हो जाए। लेकिन शास्त्रों में ऐसा कोई निषेध नहीं है। यह केवल लोक परंपरा और भावनात्मक दृष्टिकोण है। कई लोगों को अगले त्योहारों पर भी अपने परिजन के जाने का शोक रहता है और ऐसे में उन्हें पर्व-त्यौहार मनाने में ग्लानि होती है। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि यदि परिवार चाहता है कि व्यक्ति की स्मृति में कुछ किया जाए, तो आप त्यौहार न मनाना छोड़कर कुछ ऐसा कर सकते हैं जिससे आपके परिजन की आत्मा को शांति मिले, जैसे कि वृक्षारोपण, स्वास्थ्य शिविर या दान। मृत्यु जीवन का स्वाभाविक सत्य है। त्यौहार जीवन में आनंद, भक्ति और सकारात्मकता लाने के लिए होते हैं। यदि हम मृत्यु के कारण त्योहार छोड़ दें, तो यह न केवल खुशियों से दूरी होगी, बल्कि ईश्वर की आराधना से दूरी होगी।
डिसक्लेमर :-
इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गांरंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संकलित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

Recent Comments