
परिवर्तन संकल्प यात्रा के बीच पिथौरागढ़ की घटना ने खड़े किए सवाल, क्या अंदरूनी कलह फिर बिगाड़ेगी कांग्रेस का चुनावी गणित?
विशेष लेख – अशोक शर्मा
उत्तराखंड की राजनीति अब पूरी तरह 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ चुकी है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की रणनीति पर काम कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए पूरे प्रदेश में ‘परिवर्तन संकल्प यात्रा’ के माध्यम से कार्यकर्ताओं और जनता को जोड़ने का प्रयास कर रही है। दोनों दलों ने चुनावी बिगुल फूंक दिया है, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ी परीक्षा कांग्रेस के सामने अपने संगठन को एकजुट रखने की दिखाई दे रही है।
इसी बीच पिथौरागढ़ में आयोजित परिवर्तन संकल्प सम्मेलन के दौरान हुई अनुशासनहीनता ने कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल की मौजूदगी में मंच पर हुए विवाद के बाद पार्टी नेतृत्व ने महेंद्र सिंह लुंठी, दीपक लुंठी और महिला जिला कांग्रेस अध्यक्ष भावना नगरकोटी को कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिन के भीतर जवाब मांगा है। वहीं प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष ज्योति रौतेला ने भावना नगरकोटी को पदमुक्त करते हुए जिला महिला कांग्रेस कमेटी को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया।
यह कार्रवाई भले ही संगठन में अनुशासन बनाए रखने का संदेश देती हो, लेकिन यह भी स्पष्ट करती है कि कांग्रेस को चुनावी लड़ाई से पहले अपने घर को व्यवस्थित करना होगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि पार्टी के बड़े नेताओं की मौजूदगी में जिला स्तर पर इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं तो इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और जनता के बीच पार्टी की छवि पर पड़ना स्वाभाविक है।
भाजपा की मजबूत स्थिति, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
2017 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा ने 2022 में भी सरकार बनाने में सफलता हासिल की। हालांकि सीटों में कमी आई, लेकिन पार्टी ने सत्ता बरकरार रखी। वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में जुटी है।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन, केंद्र सरकार का समर्थन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और सरकारी योजनाओं का व्यापक प्रचार माना जाता है। सड़क, रेल, पर्यटन और धार्मिक परियोजनाओं को भी पार्टी अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है।
हालांकि विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, पलायन, कानून-व्यवस्था और चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय असंतोष और संगठन के भीतर समय-समय पर सामने आने वाली नाराजगी भी भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है।
कांग्रेस बदलाव का संदेश दे रही, लेकिन पहले खुद को संभालना होगा
लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस इस बार पूरी ताकत से मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। पार्टी बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है। हाल के राष्ट्रीय घटनाक्रमों और युवाओं के बीच परीक्षा प्रणाली को लेकर उठे सवालों जैसे मुद्दों को भी कांग्रेस राजनीतिक रूप से उठाने की कोशिश कर रही है।
परिवर्तन संकल्प यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना और जनता तक कांग्रेस का संदेश पहुंचाना है। लेकिन पिथौरागढ़ की घटना ने यह संकेत दिया है कि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि संगठन के भीतर अनुशासन और एकजुटता बनाए रखना भी है।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि सत्ता में वापसी का सपना देख रही है तो उसे केवल सरकार की नाकामियां गिनाने से आगे बढ़कर अपने संगठन को भी मजबूत, अनुशासित और जनता के बीच विश्वसनीय बनाना होगा।
2027 की तस्वीर क्या होगी?
अभी चुनाव में समय है और राजनीतिक समीकरण लगातार बदलेंगे। भाजपा विकास और स्थिर सरकार के मुद्दे पर जनता के बीच जाएगी, जबकि कांग्रेस बदलाव और जनसरोकारों के सवालों को चुनावी मुद्दा बनाएगी। लेकिन एक बात तय है कि चुनावी मैदान में वही दल मजबूत स्थिति में होगा, जो जनता के साथ-साथ अपने संगठन को भी एकजुट रखने में सफल रहेगा।
पिथौरागढ़ की घटना कांग्रेस के लिए एक चेतावनी भी है और अवसर भी। यदि पार्टी समय रहते संगठनात्मक मतभेदों को सुलझा लेती है तो परिवर्तन संकल्प यात्रा उसे राजनीतिक बढ़त दिला सकती है। लेकिन यदि ऐसे विवाद लगातार सामने आते रहे तो विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस के लिए सत्ता की राह एक बार फिर कठिन हो सकती है।
2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह संगठन, नेतृत्व, अनुशासन, विश्वसनीयता और जनता के विश्वास की भी परीक्षा होगी। उत्तराखंड की जनता इस बार नारों से अधिक परिणाम और भरोसे की राजनीति को परखेगी।

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