

सवाल जरूरी है
UPI ने आम आदमी की जिंदगी आसान की है। जेब में नकदी न हो तो भी भुगतान हो जाता है, दुकानदार को खुले पैसे रखने की जरूरत नहीं और कुछ सेकंड में लेनदेन पूरा। यही वजह है कि धीरे-धीरे UPI बाजार की आदत बन गया। लेकिन अब ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा व्यापारी भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होने के बाद सवाल केवल शुल्क का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने वर्षों में बनाया है।
सरकार कह रही है कि यह शुल्क ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाएगा, बल्कि दुकानदार पर लागू होगा। लेकिन क्या बाजार में दुकानदार की लागत और ग्राहक की जेब दो अलग-अलग चीजें हैं?
दुकानदार पहले ही किराया, बिजली, कर्मचारी, टैक्स और बैंकिंग खर्च का हिसाब लगाकर कारोबार करता है। अब डिजिटल भुगतान पर भी लागत जुड़ेगी तो वह उसे कहां से निकालेगा? क्या वह हर बार अपनी जेब से भुगतान करेगा? या फिर ग्राहक से कहेगा “भैया UPI रहने दो, कैश दे दो।”
और अगर ग्राहक के पास कैश नहीं हुआ तो? क्या वह अतिरिक्त पैसा देकर भुगतान करेगा?
यही वह सवाल है जिसका जवाब केवल यह कह देने से नहीं मिलता कि “चार्ज ग्राहक से नहीं लिया जाएगा।”
छोटे दुकानदार की समस्या इससे भी बड़ी है। गांव और कस्बों में आज भी कई कारोबारी तकनीक और डिजिटल लेनदेन को लेकर पूरी तरह सहज नहीं हैं। उन्हें यह चिंता भी रहती है कि डिजिटल लेनदेन का पूरा रिकॉर्ड व्यवस्था के सामने है। ऐसे में यदि UPI उनके लिए सुविधा के साथ खर्च भी बन गया, तो कैश की तरफ लौटना उनके लिए अस्वाभाविक नहीं होगा।
फिर सवाल यह भी है कि जब सरकार खुद डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देती रही है, लोगों से कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर जाने को कहा गया, तो अब उसी व्यवस्था की लागत का बड़ा हिस्सा व्यापारियों के कंधे पर क्यों?
UPI को चलाने में निश्चित रूप से खर्च होता है। साइबर सुरक्षा, सर्वर, तकनीकी ढांचा और भुगतान प्रणाली को लगातार मजबूत रखना सस्ता काम नहीं है। लेकिन क्या इसका समाधान यही है कि उस व्यवस्था का बोझ सबसे पहले छोटे दुकानदार तक पहुंचा दिया जाए?
भारत में डिजिटल भुगतान बढ़ रहा है, लेकिन नकदी भी खत्म नहीं हुई। इसका मतलब साफ है, आम आदमी अभी दोनों व्यवस्थाओं पर निर्भर है। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें भुगतान का माध्यम चुनना उसकी सुविधा हो, मजबूरी नहीं।
सरकार को यह भी देखना होगा कि कहीं शुल्क की यह शुरुआत उस भरोसे को ही कमजोर न कर दे, जिसके दम पर UPI इतना बड़ा माध्यम बना।
आखिर डिजिटल इंडिया का मतलब केवल यह नहीं कि हर दुकान पर QR कोड लगा हो।
सवाल यह है कि उस QR कोड के पीछे खड़ा दुकानदार भी खुश है या मन ही मन कह रहा है,
“डिजिटल तो कर दिया साहब, अब इसका खर्चा भी डिजिटल ही कर दीजिए… मेरी जेब से तो मत कराइए।”
यही इस फैसले की असली परीक्षा है
सुविधा बढ़ रही है या सुविधा की कीमत धीरे-धीरे आम आदमी तक पहुंच रही है?

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