अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर टैरिफ का राग अलापा है। ट्रंप ने भारत पर और अधिक टैरिफ लगाने की धमकी दी लेकिन इस बार सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कोई भी जरूरी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी। ट्रंप की धमकियों का इस बार MEA ने दृढ़ता से जवाब दिया है। अमेरिका की कथनी और करनी में फर्क उजागर करते हुए विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि जो देश भारत की आलोचना कर रहे हैं, वे खुद भी रूस से व्यापार कर रहे हैं जबिक उनके सामने ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं है। ऐसे में हमें ये समझने की भी जरूरत है कि ट्रंप की इन धमकियों से क्या वाकई बहुत बड़ा उलटफेर हो सकता है? इससे भी बड़ा सवाल ये है कि अमेरिका के लिए भारतीय बाजार क्या मायने राखता है? इन्हीं सवालों के जवाबों से ट्रंप के ‘टैरिफ दबाव’ का वजन पत चलता है।
अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार का महत्व
यहां सबसे अहम यह है कि ट्रंप के टैरिफ संबंधी बयान उस दौर में आए हैं जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। इसके बावजूद ट्रंप भारत को आर्थिक रूप से कमजोर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यदि तथ्यों पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल उलटी दिखाई देती है। वर्ष 2024-25 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 6.5% रही है और 2023 में यह 8.15% तक पहुंच गई थी। IMF और विश्व बैंक दोनों ने माना है कि भारत 2025 तक 6.2–6.5% की दर से वृद्धि करता रहेगा, जो विश्व के किसी भी बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए एक मिसाल है।
भारत की आर्थिक मजबूती को इस बात से भी समझा जा सकता है कि जहां अमेरिका और यूरोपीय देश मंदी और बैंकिंग अस्थिरता से जूझ रहे हैं, वहीं भारत में FDI के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। वर्ष 2023-24 में भारत ने लगभग 71 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर अमेरिका भारत पर टैरिफ का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है और दूसरी ओर उसकी ही बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अरबों डॉलर निवेश कर रही हैं।
टैरिफ से कितना पड़ेगा असर?
यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ का प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर लगभग नगण्य है। भारत से अमेरिका को किया जाने वाला निर्यात कुल भारतीय GDP का महज़ 2–3% ही है। इसलिए विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि ये टैरिफ पूरी तरह लागू भी हो जाते हैं तो भारतीय GDP में केवल 0.2–0.3 प्रतिशत तक का ही प्रभाव देखने को मिलेगा। यह प्रभाव इतना छोटा है कि वह देश की समग्र आर्थिक दिशा को बिल्कुल भी नहीं डगमगाएगा।
इस स्थिति का एक और पहलू यह है कि भारत की घरेलू मांग (domestic demand) इतनी मजबूत है कि वह किसी भी बाहरी झटके को सोखने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और अब अमेरिकी टैरिफ जैसे वैश्विक संकटों के बावजूद भारत की विकास दर स्थिर बनी हुई है। मोदी सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी नीतियों ने भारतीय उद्योगों को इस काबिल बना दिया है कि वे अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा में न केवल टिक सकें बल्कि नेतृत्व कर सकें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने हालिया भाषण में साफ कहा था कि भारत किसी के दबाव में नहीं झुकेगा और हम अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना जानते हैं। यह कथन उस संप्रभुता को दर्शाता है जिसे लेकर भारत आज पूरी दुनिया के सामने खड़ा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा और इससे देश को अरबों डॉलर की बचत हुई जो सीधा नागरिकों के हित में गया।
भारत या अमेरिका किस की कंपनियों की ज्यादा निर्भरता?
यह भी समझना जरूरी है कि भारत का महत्व अब केवल एक निर्यातक देश के रूप में नहीं बल्कि एक बड़े और संभावनाशील बाजार के रूप में भी बढ़ गया है। अमेरिका की दिग्गज कंपनियों जैसे- Apple, Google, Amazon, Tesla, और Microsoft के लिए भारत अब सबसे अहम बाज़ार बन चुका है। Apple ने भारत में अपना सबसे बड़ा रिटेल स्टोर खोला है और अब iPhone का मैन्युफैक्चरिंग बेस चीन से भारत शिफ्ट हो रहा है। Amazon की भारतीय ई-कॉमर्स बाजार में हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है और Google ने भारत के डिजिटल विकास में 10 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की है।
अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत की बढ़ती मिडल क्लास और टेक्नोलॉजी-प्रेमी जनसंख्या एक ऐसा आकर्षण है जिससे वे दूर नहीं रह सकतीं। इसलिए यह बात ट्रंप भी भली-भांति जानते हैं कि यदि उनकी टैरिफ ब्लैकमेलिंग ज्यादा आगे बढ़ी तो भारत सरकार काउंटर टैरिफ या डिजिटल टैक्स जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि ट्रंप की धमकियों को व्यावहारिक धरातल पर असरहीन माना जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका को भी भारत की उतनी ही जरूरत है जितनी भारत को अमेरिका की।
सरकार का निर्यातकों को राहत देने का प्लान?
एक और पहलू यह है कि मोदी सरकार ने अमेरिकी टैरिफ की घोषणा के बाद देश के निर्यातकों को राहत देने की योजना पर काम तेज कर दिया है।Marine उत्पादों पर परीक्षण शुल्क घटाया गया है, Export Credit Scheme को पुनः सशक्त किया गया है और स्थानीय स्तर पर घरेलू ब्रांड्स को अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में स्थापित करने के लिए नई रणनीतियां बनाई गई हैं। यह स्पष्ट करता है कि भारत अब reactive नहीं, बल्कि proactive रणनीति के साथ वैश्विक व्यापार करता है।
मोदी सरकार के पिछले 10 वर्षों में किए गए संरचनात्मक सुधार भी इस चुनौती को सहन करने में भारत की सहायता कर रहे हैं। GST के सफल क्रियान्वयन, Insolvency and Bankruptcy Code, बैंकिंग सुधार, PLI योजना, डिजिटल इंडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित पूंजी निवेश ने देश की आर्थिक नींव को सुदृढ़ किया है। इन सुधारों ने भारत को मात्र आयात-आश्रित अर्थव्यवस्था से एक उत्पादक और सेवा-निर्यातक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित कर दिया है।
वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक निर्णायक शक्ति
भारत का निर्यात 2013-14 में जहां USD 466 अरब डॉलर के आसपास था वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा USD 824.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इनमें सेवाएं USD 387.5 अरब और गैर-पेट्रोलियम वस्तुएं USD 374.1 अरब तक पहुंच गई हैं। यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि भारत अब वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक निर्णायक शक्ति बन चुका है।
अगर हम अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की मान्यता पर गौर करें तो IMF, World Bank, S&P, Moody’s जैसी एजेंसियों ने भारत की विकास दर को विश्व की सबसे तेज़ और टिकाऊ बताया है। UN की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत 2030 तक अमेरिका और चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि डोनाल्ड ट्रंप का भारत को ‘dead economy’ कहना या तो राजनीतिक हताशा थी ही साथ ही तथ्यों की अनभिज्ञता भी।
जनता का भरोसा कायम
यह भी समझना जरूरी है कि भारत अब अपनी विदेश नीति और व्यापार नीति को केवल कूटनीतिक सौहार्द्र या दबाव के तहत नहीं चलाता। भारत अपनी रणनीति खुद तय करता है और वह राष्ट्रहित से ऊपर कुछ नहीं मानता। यही वजह है कि अमेरिकी टैरिफ की धमकियों का भारत ने कोई भी घुटने टेक कर जवाब नहीं दिया बल्कि ‘हम हर आवश्यक कदम उठाएंगे’ कहकर वैश्विक मंच पर अपनी संप्रभुता को दोहराया है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और सकारात्मक बात यह है कि भारतीय जनमानस में सरकार के इस रुख को लेकर भरोसा और बढ़ा है। जनता को लगने लगा है कि सरकार अब अंतरराष्ट्रीय दबावों से घबराकर फैसले नहीं लेती बल्कि अपने लाभ और भविष्य की प्राथमिकताओं को सामने रखकर आगे बढ़ती है। यही सोच लोकतंत्र और आत्मनिर्भरता का सही स्वरूप है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था ना तो ट्रंप के टैरिफ से प्रभावित हुई है, ना ही भविष्य में होगी। मोदी सरकार की सतर्क रणनीति, मजबूत संरचनात्मक सुधार, आत्मनिर्भर नीतियां और वैश्विक निवेशकों का विश्वास यह सिद्ध करता है कि भारत की गाड़ी अब उस पटरी पर है जहां से विकास ही एकमात्र दिशा है।
यह भी समझना जरूरी है कि भारत अब अपनी विदेश नीति और व्यापार नीति को केवल कूटनीतिक सौहार्द्र या दबाव के तहत नहीं चलाता। भारत अपनी रणनीति खुद तय करता है और वह राष्ट्रहित से ऊपर कुछ नहीं मानता। यही वजह है कि अमेरिकी टैरिफ की धमकियों का भारत ने कोई भी घुटने टेक कर जवाब नहीं दिया बल्कि ‘हम हर आवश्यक कदम उठाएंगे’ कहकर वैश्विक मंच पर अपनी संप्रभुता को दोहराया है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और सकारात्मक बात यह है कि भारतीय जनमानस में सरकार के इस रुख को लेकर भरोसा और बढ़ा है। जनता को लगने लगा है कि सरकार अब अंतरराष्ट्रीय दबावों से घबराकर फैसले नहीं लेती बल्कि अपने लाभ और भविष्य की प्राथमिकताओं को सामने रखकर आगे बढ़ती है। यही सोच लोकतंत्र और आत्मनिर्भरता का सही स्वरूप है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था ना तो ट्रंप के टैरिफ से प्रभावित हुई है, ना ही भविष्य में होगी। मोदी सरकार की सतर्क रणनीति, मजबूत संरचनात्मक सुधार, आत्मनिर्भर नीतियां और वैश्विक निवेशकों का विश्वास यह सिद्ध करता है कि भारत की गाड़ी अब उस पटरी पर है जहां से विकास ही एकमात्र दिशा है।

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