

विकासनगर, 2 अगस्त। देहरादून जनपद में चाय बागान सीलिंग भूमि को लेकर विवाद ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। जन संघर्ष मोर्चा ने आरोप लगाया है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद तहसील प्रशासन द्वारा ऐसी भूमि की खरीद-फरोख्त और दाखिल-खारिज पर रोक लगा दी गई है, जो कानूनन सीलिंग अधिनियम के दायरे में ही नहीं आती।
मोर्चा अध्यक्ष एवं जीएमवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल अपील संख्या 2697/1984 में 24 अक्टूबर 1996 को स्पष्ट किया था कि 10 अक्टूबर 1975 से पूर्व खरीदी गई भूमि उत्तर प्रदेश सीलिंग एक्ट की धारा 6(3) के दायरे में नहीं आती। बावजूद इसके, वर्ष 2023 में जिला प्रशासन द्वारा जारी आदेशों के तहत संबंधित भूमि के क्रय-विक्रय पर रोक लगा दी गई है।
नेगी ने बताया कि देहरादून जनपद के एनफील्ड ग्रांट, जमनीपुर, एटनबाग, ईस्ट होप टाउन, बदामावाला, अंबाड़ी, रायपुर, जीवनगढ़, कंडोली, कांवली, हरबंसवाला, मोहकमपुर खुर्द, बंजारावाला माफी, आर्केडिया ग्रांट, मलूकावाला, मिट्ठी बहेड़ी, लाडपुर और नत्थनपुर सहित कई क्षेत्रों में चाय बागान सीलिंग भूमि के नाम पर भवन स्वामियों और काश्तकारों को जिला प्रशासन के माध्यम से जबरन शोषण किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन को प्रत्येक मामले में भूमि की वास्तविक कानूनी स्थिति, खरीद का वर्ष और स्वामित्व की जांच करने के बाद ही निर्णय लेना चाहिए। बिना तथ्यों की पड़ताल किए सभी मामलों पर एक समान रोक लगाना सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना है। नेगी ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई भूमि वास्तव में सीलिंग की जद में आती है तो प्रशासन को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन निर्दोष लोगों को परेशान करना उचित नहीं है।
मोर्चा का कहना है कि इस आदेश से आम नागरिकों, अधिवक्ताओं और भूमि से जुड़े अन्य लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, साथ ही पंजीकरण न होने से सरकार को भी भारी राजस्व की हानि हो रही है। मोर्चा ने इस मामले को शीघ्र ही जिला प्रशासन के समक्ष उठाने और प्रभावित लोगों को राहत दिलाने की बात कही।
पत्रकार वार्ता में मोर्चा के महासचिव आकाश पंवार तथा प्रवीण शर्मा ‘पिन्नी’ भी उपस्थित रहे।

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