
प्रेरणादायक कहानी – खुशबू पाटिल की
बेंगलुरु की चमक छोड़ बुरहानपुर की मिट्टी चुनी, मां-बाप के नाम पर रखी कंपनी
बुरहानपुर/देहरादून। कुछ लोग सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हैं। और कुछ लोग उन सीढ़ियों से उतरकर वहां लौट जाते हैं, जहां से उनकी असली कहानी शुरू हुई थी। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के बोरसार गांव की खुशबू पाटिल ऐसी ही एक कहानी हैं — जो शतरंज के उस मोहरे की याद दिलाती हैं, जो पीछे हटता है तो हारने के लिए नहीं, वार करने के लिए।
5 फरवरी 2000 को किसान युवराज पाटिल के घर जन्मी खुशबू का बचपन केले के बागों की छाया में बीता। शतरंज खेली, जिला से राज्य स्तर तक पहुंची। पढ़ाई में आगे रहीं। लेकिन 2017-18 में एक तूफान ने सब बदल दिया — शाब्दिक रूप से भी, और लाक्षणिक रूप से भी। एक रात के तूफान ने पाटिल परिवार के केले के बागों को तहस-नहस कर दिया। ₹70 लाख का नुकसान। कर्ज पहले से था। पिता का मानसिक संतुलन डगमगाया। मां अनीता बिना एक शब्द बोले पूरे घर की नींव बनी रहीं।
खुशबू का किसी बड़े संस्थान में पढ़ने का सपना टूटा। बुरहानपुर के स्थानीय कॉलेज में दाखिला लिया, पढ़ाई के साथ “खुश पार्लर डिजाइनिंग” नाम का छोटा व्यवसाय खड़ा किया। वो रुकीं नहीं। इंदौर गईं, ट्रैवल मैनेजमेंट किया, फिर कर्जत के यूनिवर्सल बिजनेस स्कूल से एमबीए किया — और लगातार दो साल कॉलेज ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीते।
बेंगलुरु में रिलायंस रिटेल के हेडक्वार्टर में फैशन एंड लाइफस्टाइल डिवीजन में असिस्टेंट मैनेजर बनीं। सालाना ₹7 लाख का पैकेज। एसी ऑफिस। चमकदार जिंदगी। लेकिन उस कुर्सी पर बैठे-बैठे एक सवाल चैन नहीं लेने देता था — किसान फसल उगाता है, बिचौलिया बेचता है, मंडी कीमत तय करती है, और किसान बस हाथ देखता रह जाता है।

यह सिर्फ विचार नहीं था। यह उनके पिता की पूरी जिंदगी थी। बुरहानपुर के उन 18,640 किसानों की पीड़ा थी जो 26,000 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर केला उगाते हैं और हर साल मंडी के सामने हाथ फैलाते हैं।
जनवरी 2026 में खुशबू ने नौकरी छोड़ी और बुरहानपुर लौट आईं। बुरहानपुर का “कमानी केला” जो भुसावल जंक्शन से लोड होने के कारण “भुसावली केला” के नाम से मशहूर है और दुबई, ईरान, सऊदी अरब तक जाता है — उसी केले से सीधे चिप्स बनाने का फैसला किया। ब्रांड नाम रखा “MP 68″। और कंपनी का नाम रखा — “युवराज और अनीता पाटिल एंटरप्राइजेज।” पिता का नाम। मां का नाम। जिन्होंने तूफान में भी हार नहीं मानी।
₹8 से 10 लाख के निवेश से शुरू इस स्टार्टअप में गांव के 10 लोगों को रोजगार मिला। MP, झारखंड, कर्नाटक, गुजरात, पुणे, इंदौर से ऑर्डर आने लगे। जून 2026 में बुरहानपुर के केले को 12 साल की कोशिश के बाद GI टैग भी मिल गया। खुशबू का अगला लक्ष्य है 50 लोगों को रोजगार देना और “MP 68” को दुनिया के हर कोने तक पहुंचाना।
खुशबू ने कभी नहीं कहा कि “मैंने सब छोड़ा।” उन्होंने कहा — “मैं लौट आई।” जो छोड़ता है वो पीठ दिखाता है। जो लौटता है वो जड़ों की तरफ मुड़ता है। खुशबू पाटिल अपने पूरे गांव की पहली बेटी हैं जिन्होंने ऐसा स्टार्टअप शुरू करने की हिम्मत दिखाई — और साबित किया कि मिट्टी से कटकर नहीं, मिट्टी से जुड़कर भी सफलता मिलती है।
(साभार: राहुल मिश्रा, फेसबुक)

Recent Comments